Tuesday, 28 February 2017

सरकारी स्कूल की छात्राओं का YouTube पर धमाल, डाला ऐसा गाना, 81 लाख ने सुना


सरकारी स्कूल में 9वीं, 10वीं क्लास में पढ़ने वाली कुछ छात्राओं ने भगवान कृष्ण पर ऐसा गाना गाया है जिसने पूरे YouTube पर धमाल मचा रखा है। आप भी सुनिए तारीफ किए बिना नहीं रह पाएंगे।
एक कर्णप्रिय गीत इन दिनों यू-ट्यूब और तमाम साइट्स पर छाया हुआ है।
रोहतक के सांघी गांव के डॉ. स्वरूप सिंह गवर्नमेंट मॉडल संस्कृति स्कूल की 9वीं, 10वीं और 11वीं की छात्राओं द्वारा गाए गए इस गीत 'बता मेरे यार सुदामा रै.....भाई घणे दिना में आया' को लगभग 81 लाख लोग सुन चुके हैं।
संगीत के साथ पढ़ाई में भी अव्वल ठेठ देहाती परिवेश की बच्चियों विधि, ईशा, शीतल, मनीषा, मुस्कान और रिंकू को सराहना के फोन देश के कोने-कोने से आ रहे हैं। इन बच्चियों ने अपनी कामयाबी का श्रेय माता- पिता और म्यूजिक टीचर सोमेश जांगड़ा को दिया है।
मां ने दिया गीत को लिखकर
विधि ने बताया कि यह भक्ति गीत उसकी मां संतोष ने रिठाल गांव में हुए सत्संग में सुना था और मां ने ही उसे गीत को लिख कर दिया था। बचपन से ही गाने का शौक था। उसने फरवरी 2016 में स्कूल की बाल सभा में गाना गाकर प्रिंसिपल जयपाल दहिया से 500 रुपये का इनाम हासिल किया था। म्यूजिक टीचर सोमेश जांगड़ा ने मेरे यार सुदामा रै--गीत को मार्च में रीमिक्स सांग का रूप देकर रियाज करवाया।
स्कूल की बच्चियों ने 12 अप्रैल 2016 को पहली बार महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के टेगौर सभागार में यह रीमिक्स सांग गाया था। गीत को सुनकर गीता मर्मज्ञ स्वामी ज्ञानानंद ने नैतिक शिक्षा पुस्तक के विमोचन अवसर पर इस गीत को सुनाने का निमंत्रण दिया। गीत सुनकर कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने विधि और साथी बच्चियों को 31000 रुपये का पुरस्कार दिया।
गीत को गाने वाली लड़कियां है अलग-अलग गांव से
गीत की मुख्य गायिका विधि ने बताया कि वह घिलौर गांव से और गीत में साथ देने वाली ईशा रूखी, शीतल, मनीषा और मुस्कान जसिया एवं रिंकू सांघी गांव की रहने वाली है। विधि नौवीं, ईशा, मनीषा, मुस्कान, रिंकू 10वीं और शीतल 11वीं कक्षा में पढ़ रही है।
खेती- बाड़ी करते है छात्राओं के परिजन
विधि और मनीषा ने बताया कि उनके परिवार वाले खेती- बाड़ी करते हैं। इसी से गुजर-बसर चलती है। ईशा के पिता गांव में ही किरयाने की दुकान चलाते हैं। मुस्कान के पिता आर्मी में हैं तो रिकूं के पिता गांव में ही मिस्त्री का काम करते हैं।
स्कूल में करीब 31 गांवों के 1800 बच्चे पढ़ते हैं। तकरीबन सभी बच्चे प्रतिभा के धनी हैं। विधि, रिंकू, ईशा, शीतल, मनीषा और मुस्कान के इस गीत ने सभी का दिल जीत लिया है। छात्राओं ने स्कूल के साथ गांव, माता- पिता और जिले का नाम भी रोशन किया है।
- जयपाल दहिया, प्रिंसिपल, डॉ. स्वरूप सिंह गवर्नमेंट मॉडल संस्कृति स्कूल सांघी।

देश भर में सुपरहिट इन बच्चियों की आवाज में वो जादू है, मदहोश हो जाएंगे आप

देश भर में सुपरहिट इन बच्चियों की आवाज में वो जादू है, मदहोश हो जाएंगे आप





देश भर में सुपरहिट हुई इन पांच बच्चियों की आवाज में वो जादू है, सुनकर आप मदहोश हो जाएंगे। इनके एक गाने ने यूट्यूब पर धमाल मचा रखी है। आप भी सुनिए।
इस गीत के बोल हैं, 'बता मेरे यार सुदामा रै.....भाई घणे दिना में आया'।
हरियाणा में रोहतक जिले के सांघी गांव के डॉ. स्वरूप सिंह गवर्नमेंट मॉडल संस्कृति स्कूल की 9वीं, 10वीं और 11वीं की छात्राओं ने इस गीत को गाया है। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती पर गाए गए इस गीत को अब तक कई लाख लोग सुन चुके हैं। गायिकाओं के नाम हैं- विधि, ईशा, शीतल, मनीषा, मुस्कान और रिंकू


संगीत के साथ पढ़ाई में भी अव्वल ठेठ देहाती परिवेश की इन पांचों बच्चियों को पूरा देश सराह रहा है और ये बच्चियां अपनी कामयाबी का श्रेय माता- पिता और म्यूजिक टीचर सोमेश जांगड़ा को देती हैं। मुख्य गायिका विधि बताती हैं कि यह भक्ति गीत उसकी मां संतोष ने रिठाल गांव में हुए सत्संग में सुना था और मां ने ही उसे गीत को लिख कर दिया था। उसने फरवरी 2016 में पहली बार स्कूल की बाल सभा में इसे गाकर इनाम जीता था।
विधि ने बताया कि उसके बाद म्यूजिक टीचर सोमेश जांगड़ा ने मेरे यार सुदामा रै--गीत को मार्च में रीमिक्स सांग का रूप देकर रियाज करवाया। फिर 12 अप्रैल 2016 को पहली बार महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के टैगौर सभागार में यह रीमिक्स गीत गाया। इसे सुनकर गीता मर्मज्ञ स्वामी ज्ञानानंद ने नैतिक शिक्षा पुस्तक के विमोचन अवसर पर इस गीत को सुनाने का निमंत्रण दिया। गीत सुनकर कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने उन्हें 31000 रुपये का पुरस्कार दिया।
विधि ने बताया कि वह घिलौर गांव से और गीत में साथ देने वाली ईशा रूखी, शीतल, मनीषा और मुस्कान जसिया एवं रिंकू सांघी गांव की रहने वाली है। विधि नौवीं, ईशा, मनीषा, मुस्कान, रिंकू 10वीं और शीतल 11वीं कक्षा में पढ़ रही है। उनके परिवार वाले खेती- बाड़ी करते हैं। इसी से गुजर-बसर चलती है। ईशा के पिता गांव में ही किरयाने की दुकान चलाते हैं। मुस्कान के पिता आर्मी में हैं तो रिकूं के पिता गांव में ही मिस्त्री का काम करते हैं।
स्कूल में करीब 31 गांवों के 1800 बच्चे पढ़ते हैं। तकरीबन सभी बच्चे प्रतिभा के धनी हैं। विधि, रिंकू, ईशा, शीतल, मनीषा और मुस्कान के इस गीत ने सभी का दिल जीत लिया है। छात्राओं ने स्कूल के साथ गांव, माता- पिता और जिले का नाम भी रोशन किया है।
- जयपाल दहिया, प्रिंसिपल, डॉ. स्वरूप सिंह गवर्नमेंट मॉडल संस्कृति स्कूल सांघी

Saturday, 25 February 2017

History of Jai Bada Dev Mandir Narsinghpur, Madhya Pradesh

इतिहासिक बडा देव मंदिर नरस‍िंंहपुर


मध्‍यप्रदेश के नर‍स‍िं‍हपुर जिले मेंं  लगभग महज 5 किलोमीटर की दूरी पर यह एक मेनावारी गाव में स्‍ि‍थति एक अनोखा मंद‍िर आदिवासीओं जनजात‍ि के देवता बडादेव नाम के भागवान जी का मंद‍िर  हैं यहा के लोगो द्वारा इस मंद‍िर की मन्‍यता यह है कि यहा भागवान बडादेव की पूजा से सभी की मनोकामना पूर्ण हो जाती है यहा के निवास‍िओ के अनुसार यहा पर कई वर्षो पहले जंगल हुआ करता था यहा एक आदिवासी  किसी मरकाम गोत्र के व्‍यक्‍ति द्वारा यहा पर एक व‍िशाल पीपल के पेड के नीचे प्रतिदिन पूजन अर्चन किया जाता था 
उसी व्‍यक्‍‍ित्‍ा द्वारा यहा पर उस पेड के नीचे मंदिर का निर्माण करवाया गया और आज भी प्रत्‍येक शान‍िवार को यहा पूजन क‍िया जाता है यहा पर समय समय पर विशेष पूजाअर्चन भी किया जाता है 






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BATA MERE YAAR SUDAMA RE BY VIDHI NEW EXCLUSIVE VIDEO BHAKTI SONG 2017 ...

Friday, 24 February 2017

Dada Maharaj(Dulhadev) Narsinghpur NH26 hwy

Dulhadev temple narsinghpur


महाशिवरात्रि 2017 पूजा विधि: इन मंत्रों के जाप के साथ इस तरह करें पूजा, पूरी होगी मनोकामना

महाशिवरात्रि का महापर्व आने वाले है और शिवालयों में इसकी तैयारी भी शुरू हो चुकी है। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन व्रत करने से और पूजा करने से सभी कष्ट दूर होते हैं। इस दिन जो भगवान शिव की पूजा करता है, उसे भूत-प्रेत की पीड़ा, ग्रहों से होने वाली दिक्कतें दूर होती है। आइए जानते हैं इस दिन किस तरह से भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए और जानिए क्या है पूजा करने की विधि।
महाशिवरात्रि को पूजा करते वक्त सबसे पहले मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। वहीं अगर घर के आस-पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिवलिंग बनाकर भी उसे पूजा जा सकता है। वहीं इस दिन शिवपुराण का पाठ सुनना चाहिए और पाठ करना चाहिए। शिव पुराण में महाशिवरात्रि को दिन-रात पूजा के बारे में कहा गया है और चार पहर दिन में शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक कर बेलपत्र चढ़ाने से शिव की अनंत कृपा प्राप्त होती है। कई लोग चार पहर की पूजा भी करते हैं, जिसमें बार बार शिव का रुद्राभिषेक करना होता है।
चारों प्रहर के पूजन में शिवपंचाक्षर (नम: शिवाय) मंत्र का जाप करें। भव, शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महान, भीम और ईशान, इन आठ नामों से फूल अर्पित कर भगवान शिव की आरती व परिक्रमा करें। अगर आपने व्रत नहीं किया है तो आपको सामान्य पूजा तो अवश्य करनी चाहिए। जिसमें शिवलिंग को पवित्र जल, दूध और मधु से स्‍नान करवाएं। भगवान को बेलपत्र अर्पित करें। इसके बाद धूप बत्‍ती करें। फिर दीपक जलाएं। ऐसा करने से सभी कष्ट दूर होते हैं। इस दिन इन दो मंत्रों का जाप करें।
शिव वंदना
ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं, वन्दे जगत्कारणम्।
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं, वन्दे पशूनां पतिम्।।
वन्दे सूर्य शशांक वह्नि नयनं, वन्दे मुकुन्दप्रियम्।
वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं, वन्दे शिवंशंकरम्।।
– महामृत्‍युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माम् मृतात् ।।

महाशिवरात्रि पर भोलेबाबा को खुश करने के लिए चढ़ाएं ये चीजें, पूरे होंगे सभी काम

कल महाशिवरात्रि है और इस दिन हर शिवालय में भक्त भोलेबाबा की पूजा करते हैं और भगवान शंकर से मनोकामनाएं मांगते हैं। कहा जाता है अगर इस दिन सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करे तो भगवान खुश होकर भक्त की मनोकामना पूरी कर देते हैं। इसलिए आज हम आपको बता रहे हैं कि आपको इस दिन भगवान शिव को क्या अर्पित करना चाहिए और भगवान किस चीज से जल्दी खुश होते हैं।
दूध- आपने देखा होगा कि लोग शिवरात्रि के दिन भगवान शिव को दूध चढ़ाते हैं और दूध चढ़ाने से भक्त और भक्त के परिवार का स्वास्थ्य ठीक रहता है और घर में समृद्धि बनी रहती है। वहीं दूध में हल्दी मिलाकर चढ़ाने से संतान की प्राप्ति होती है।
बिल्व पत्र- महाशिवरात्रि पर बिल्व पत्र चढ़ाने से भगवान शंकर खुश होते हैं और इससे धन की भी प्राप्ति होती है। इसके लिए भगवान के तीन पत्ते वाला सेट चढ़ाएं और अगर इस वक्त नमो बिल्ल्मिने च कवचिने च नमो वर्म्मिणे च वरूथिने च, नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुब्भ्याय चा हनन्न्याय च नमो घृश्णवे॥ का जाप करेंगे तो और भी उत्तम होगा।
सफेद आकड़े के फूल- वैसे तो भगवान को कई तरह के फूल चढ़ाए जाते हैं, लेकिन सफेद आकड़े के फूल का अलग महत्व होता है। ऐसा करने से परिवार में सुख समृद्धि आती है और दुख दूर होते हैं।

Saturday, 11 February 2017

महाशिवरात्रि की पवित्र, प्राचीन और प्रामणिक कथा

महाशिवरात्रि की पवित्र, प्राचीन और प्रामणिक कथा  


पूर्व काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका।

क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी।

शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया।  जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा।
जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा।

शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' 


शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथमप्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया।

कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे शिकारी!

मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।'  

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई।

तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली, 'हे शिकारी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे। उत्तर में हिरणी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करों, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।

हिरणी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा।  

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके में एक क्षण भी दुख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया।
थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके।, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया।
अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिव जी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जान कर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए।

शिकारी की कथानुसार महादेव तो अनजाने में किए गए व्रत का भी फल दे देते हैं। पर वास्तव में महादेव शिकारी की दया भाव से प्रसन्न हुए। अपने परिवार के कष्ट का ध्यान होते हुए भी शिकारी ने मृग परिवार को जाने दिया। यह करुणा ही वस्तुत: उस शिकारी को उन पण्डित एवं पूजारियों से उत्कृष्ट बना देती है जो कि सिर्फ रात्रि जागरण, उपवास एव दूध, दही, एवं बेल-पत्र आदि द्वारा शिव को प्रसन्न कर लेना चाहते हैं।  

इस कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस कथा में 'अनजाने में हुए पूजन' पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह नहीं है कि शिव किसी भी प्रकार से किए गए पूजन को स्वीकार कर लेते हैं अथवा भोलेनाथ जाने या अनजाने में हुए पूजन में भेद नहीं कर सकते हैं।  

जानिए अपनी राशि के अनुसार किस रंग से खेलें होली

Govind Thakur Narsinghpur (M.P.) जानिए अपनी राशि के अनुसार किस रंग से खेलें होली वैसे तो हर त्यौहार का अपना एक रंग और महत्व होता है, लेक...